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''बचपन
में झाकें - बड़े सपने याद करें - सफलता की ओर कदम बढ़ायें''
एक बार बादशाह अकबर ने दाढ़ी रखी हुई थी। उन्होंने अपने दरबार में पूछा कि
मेरी दाढ़ी खींचने वाले को क्या सजा दी जानी चाहिए ? बहुत से दरबारियों ने
कहा की कोई बादशाह कि दाढ़ी तक पहुँच ही नहीं सकता। किसी ने कहा कि उसका
मुँह काला कर गधे पर बिठा कर शहर में घुमाना चाहिए। किसी ने कठोर कारावास
की सजा बताई। किसी ने देश निकाला की सजा बताई तो किसी ने फॉसी पर चढ़ाने की
बात कहीं।
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जब
बीरबल से पूछा गया तो उसने कहा कि उसे ढेर सारा प्यार दिया जाना चाहिए।
बादशाह ने नाराजगी जाहिर करते हुए पूछा क्यों ? तब बीरबल ने कहा
कि बादशाह की दाढ़ी उनका तीन साल का पोता ही खींच सकता हैं। बच्चों के
लिए बादशाह और रंक सब बराबर हैं। यह बात एकदम सही हैं। बचपन एकदम अनूठा
और निराला होता हैं। वह हर डर और गम से बेगाना होता हैं। बच्चे की
कल्पना शक्ति बहुत अधिक होती हैंतथा इच्छायें भी बड़ी-बड़ी होती हैंपर
जैसे - जैसे वह बड़ा होता जाता हैंउसे लोग डराते हैं, दुनिया दारी बताते
हैं, और उसके सपने नष्ट कर देते हैं। हर एक की जिन्दगीं में बचपन की
खट्टी मीठी यादें होती हैं। व्यक्ति अपने बचपन के बडे सपनों को भूल कर
केवल डर पैदा करने वाले बंधनकारी बातॉ के प्रभाव में रहकर, अपनी
जिन्दगीं बिताने लगता हैं। कुछ बातॉ का प्रभाव जाने अनजाने में लोगो पर
इतना गहरा होता हैंकि वह उसे अपनी जिन्दगीं पर लागू भी करता हैं। वह
उसे सच भी मानता हैं। मैं जानता हूँ कि हर आदमी को अपने हिसाब से जीने
का हक होता हैंपरन्तु अपनी क्षमता के अनुसार सफलता के सर्वोच्च शिखर पर
पहुँचने के लिए उसे सही गलत धारणा का फिर से आंकलन करना चाहिए।
उदाहरण-
पैसे के मामले मे धारणायें -
1-
अधिक
पैसे वाले अधिक दुखी होतें हैं, इसलियें पैसा क्यों कमाना ? जबकि सच्चाई यह
हैंकि वह व्यक्ति अधिक पैसे कमाने में अक्षम होता हैं।
2-
अपने पैसे से जितना
धंधा हो सकता हैंकरना चाहिए। जबकि विश्व के जितने भी बड़े व्यापारिक संस्थान
हैं वह लोगॉ अथवा बैंक के पैसे के बिना नहीं चलते।
3-
ज्यादा पैसे केवल गलत तरीके से कमाया जा सकता हैं। जबकि ज्ञान, अनुभव, लगन,
मेहनत, सही, रास्ता, सकारात्मक सोच तथा सौभाग्य के द्वारा बहुत ज्यादा कमाई
हो सकती हैं।
इसी तरह जिन्दगी के तथा किसी लक्ष्य के मामले में आदमी अपने को पहले ही
अक्षम मान लेता हैं और सचमुच अक्षम
हो जाता हैं।
सन् 1973 में राजनांदगांव
के प्रथम
जिलाअध्यक्ष श्री अरूण क्षेत्रपाल का एक भाषण मैंने सुना था। उस वक्त मेरी
उम्र 10 वर्ष थी उन्हॉने बताया की कलेक्टर बनने के लिए मैंने कुछ
नहीं किया, बस बचपन में मैंने पढ़ाई के टेबल पर कलेक्टर लिख दिया और
रोज उसे देखता था।
मैं एक व्यापारिक परिवार से था, मेरे मामा मौसा इत्यादि इंजीनियर थें।
मैंने इंजीनियर बनने की चाह को पढ़ाई के टेबल के कोने में छिपा कर लिखा। रोज
उसे पढता और कई बार अपने आप से ये भी कहता कि इंजीनियर साहब क्या हालचाल
हैंऔर अंतत: मै इंजीनियर बना।
हर एक के जीवन में बचपन में बहुत अच्छी घटनायें घटती हैं। किसी क्षेत्र में
अधिक रूचि अथवा उत्कृष्टता रहती हैंऔर आगे चलकर वह भुला दी जाती हैं।
बचपन में झांके - बड़े सपने याद करें और सफलता की ओर कदम बढ़ायें
मधुर चितलांग्या
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