| दिल ढूंढ़ता है, फिर वही फुर्सत के रात-दिन"
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मैं अलसाया सा अपने इन्जीनियरिंग कालेज होस्टल के कमरें में लेटा हुआ था, आंखे
आधी बंद, दिमाग में कोई विचार नही और जिन्दगी एक दम हसीन लग रही थी। एक दोस्त आया
पूछा क्या कर रहा है ? मैने कहा ""कुछ नही""। "आज क्या प्रोग्राम है ? मैने कहा
""सोचा नही""। नयी पुरानी कोई खबर ? मैने कहा ""पता नही""। जिन्दगी कैसी गुजर रही
है ? मैने कहा ""एक दम टना-टन""।
कितनी अजीब बात है, आज हम व्यस्त हैं, पर उतने खुश नही। क्या आप
भी मेरी तरह फुर्सत के उन खोए पलों में जीना चाहते हैं ? क्या आप भी कई बार अकेले
में बीते दिनों के उन बेकारी के हसीन लम्हों को याद करते हैं ? दुनिया व्यस्त आदमी
को इज्जत देती है व फुर्सतिया का मजाक बनाती है इसलिये हम फुर्सत की अन्दरूनी चाहत
के बावजूद अपने को व्यस्त रखते हैं।
मौज मस्ती से दिमागी तनाव व थकान कम हो सकती है पर शारीरिक थकान
नहीं। हमारी T20 क्रिकेट टीम की पब पार्टी-बाजी इसका सबूत है। अब वैज्ञानिक रूप से
साबित हो गया है कि बिना किसी सोच में रहने से आदमी मस्त एवं शारीरिक एवं मानसिक
रूप से तरो ताजा होने लगता है और उसके दिमाग की क्षमता भी बढ़ती है। विदेशो में मछली
पकड़ने जाने का या सन-बाथ लेने का प्रचलन बहुत बढ़ा है। व्यस्ततम लोगों से अनुरोध है
कि वे भी कभी फुर्सतिया छुट्टी मनाए और बिन्दास होकर गुनगुनाए गुलजार का लिखा गीत
"दिल ढूंढ़ता है, फिर वही फुर्सत के रात-दिन"। यह अंक उन्हे समर्पित है।
दिल ढूंढ़ता है, फिर वही फुर्सत के रात-दिन"
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| Posted by Madhur Chitalangia
2 Comments
Tue 06 Jul 10, 11 : 10 am |
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Madhur Chitlangia
Bhilai |