| अपने सबसे बड़े दुश्मन को पहचाने
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अपने सबसे बड़े दुश्मन को पहचाने |
| बचपन में मेरे प्रियमित्र संजय सिंह परिहार ने मुझसे कहा यार मेरी अजीब सी फितरत है। थकता हूं तो तब पूरी ताकत से सायकल चलाता हूं। लड़ाई में हारता रहता हूं तब पूरी हिम्मत से मुकाबला करता हूं और परीक्षा सिर पर आती है तभी जमकर पढ़ाई करता हूं। देर से मुझे समझ आया कि उसकी खुद का आकलन करने की क्षमता कम उम्र मे ही बहुत अच्छी थी।
हममें से प्राय: अधिकत्तर लोगों के साथ ऐसा होता है। दवाब में हमारा परफार्मेनश ज्यादा बेहतर होता है। हम बहुत बार पहले से ही आने वाले कार्य/दवाब/परीक्षा/परेशानी के बारे में जानते है फिर भी दवाब बढ़ने तक पूरी क्षमता से कार्य नही करते। जबकि हमें मालूम रहता है कि अधिक दवाब में दक्षता कम हो जाती है और परिणाम खराब होने की संभावना बढ़ जाती है। हम सभी ने कई बार सही समय पर तैयारी न करने का दुष्परिणाम भोगा है।
एक बड़ी कार्पोरेट कम्पनी में लंच लेकर जब कर्मचारी लौटे तो बड़े दरवाजे पर एक पोस्टर पर लिखा था कि कम्पनी में आपकी तरक्की के सबसे बड़े दुश्मन की मृत्यु हो गई है और आडिटोरियम में उसकी डेड बॉडी पड़ी है। यह चिट्ठी जिसके लिए है वह समझ ले। सभी सोच में पड़ गये। प्रत्येक व्यक्ति किसी ना किसी को अपनी तरक्की में बाधा समझता था। सब हाल में लाईन से पहुंचे। एक के बाद एक ताबूत पर फूल चढ़ाने जाते और ऊपर कांच से अंदर देखते तो चौक जाते। अन्दर एक आइना लगा था जिस पर लिखा था ”अपना सबसे बड़ा दुश्मन कार्य टालने की आदत से आप खुद बन जाते हैं“।
हम सही वक्त पर अपना कार्य कर अपने को ऊंचाइयों पर पहुंचाने के लिए सबसे बड़े दोस्त बन सकते है और टालने की प्रवृत्ति पाल कर सबसे बड़े दुमन भी। खुद से दोस्ती का वादा करने वालों के लिए यह अंक समर्पित हैं। मधुर चितलांग्या (प्रधान संपादक)
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मधुर चितलांग्या |
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| Posted by Madhur Chitalangia
6 Comments
Wed 10 Mar 10, 4 : 37 pm |
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Madhur Chitlangia
Bhilai |