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अस्थमा जानकारी एवं उपचार
अस्थमा पीड़ित लोगों में आमतौर पर घबराहट और तेज खांसी, सांस लेने में तकलीफ और घुटन जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। ऐसा फेफड़ों तक हवा पहुंचाने वाली ट्‌यूब में रूकावट, सूजन, रूखापन या कफ आदि जमा होने के कारण होता है। ट्‌यूब संकरी हो जाने के कारण सांस लेने और छोड़ने के लिए काफी कम जगह बचती है। ऐसे लोगों का गला व छाती काफी सेंसटिव होती है।
अस्थमा के कारण -
1. पुश्तैनी मर्ज - उन बच्चों में अस्थमा की शिकायत ज्यादा होती है जिनकी फैमिली हिस्ट्री अस्थमा की होती है।
2. एलर्जी - एलर्जी के कई कारण हो सकते हैं। मसलन, खाने-पीने की चीजों में रासायनिक खाद का ज्यादा इस्तेमाल, धूल, मिटटी, घास, कुत्ते-बिल्ली जैसे बालों वाले जानवर, कुछ दवाएं और घर के अंदर सीलन आदि।
3. इन्फेक्शन- सांस की नली में कुछ बैक्टीरिया या वायरस के जाने से अंदर सूजन हो जाती है और सांस की नलियां सिकुड जाती हैं। इससे सांस लेने और छोड़ने में काफी परेशानी होती है।
4. वातावरण - सड़को पर अंधाधुंध बढ़ रही गाड़ियों की संख्या के अलावा दिल्ली जैसे शहरों में विलायती बबूल जैसे पेड़ भी एलर्जी की समस्या बढ़ाने का काम कर रहे हैं। इसके अलावा मौसमी बदलाव भी इसमें अहम भूमिका निभाता है। खासतौर से अक्टूबर-नवंबर और फरवरी-मार्च के महीने में समस्या काफी बढ़ जाती है।
5. कुछ मुश्किल एक्सरसाइज- कुछ ऐसी मुश्किल एक्सरसाइज अस्थमा की वजह बन सकती हैं, जिनसे हार्ट बीट 150 प्रति मिनट से ज्यादा बड़ जाए।
6. मनोवैज्ञानिक - अस्थमा के कुछ मनौवैज्ञानिक कारण भी देखे गए हैं, जिनका प्रभाव बच्चों पर सबसे ज्यादा होता है। मसलन, अगर मां या पिता किसी बात को लेकर बच्चे को बहुत ज्यादा डांटते है तो डर से बच्चे के अंदर घबराहट की एक टेंडेंसी डेवेलप हो जाती है, जो कई बार आगे चलकर सांस की दिक्कत में बदल जाती है।
अटैक आने पर क्या करें -
1. अटैक आने पर लेटें नहीं, बैठ जाएं।
2. मरीज की पीठ सहलाएं, इससे सांस लेने में आसानी होगी।
3. रिलैक्स के लिए कंधो का ढीला रखें और आराम करें।
4. फौरन राहत के लिए इनहोलर का इस्तेमाल करें।
5. अगर इनहेलर से आराम न मिले तो नेब्युलाइजर लगाएं।
6. फौरन डाक्टर के पास जाएं।
अस्थमा का इलाज
अस्थमा के इलाज के लिए कुछ दवाओं व इनहेलर का इस्तेमाल किया जाता है। इससे सांस की नली और फेफड़ों की जकड़न खुल जाती है और मरीज आराम से सांस ले सकता है। वैसे तो अस्थमा का कोई पर्मानेंट इलाज नहीं है, मगर प्राणायाम, योग और पौष्टिक आहार लेकर इसे काफी हद तक कंट्रोल में रखा जा सकता है।
होमियोपैथी में अस्थमा का इलाज -
होमियोपैथी में भी अस्थमा का कारगर इलाज है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अस्थमा के अलग-अलग लक्षणों के आधार पर मरीज का इलाज किया जाए तो बीमारी पर बहुत हद तक काबू पाया जा सकता है। आमतौर पर माना जाता है कि होमियोपैथी से इलाज में वक्त ज्यादा लगता है, लेकिन इस पैथी में भी अस्थमा की कुछ ऐसी दवाएं उपलब्ध है जो तुरंत राहत देती हैं।
अस्थमा के लिए फायदेमंद योग क्रियाएँ
कपालभाति, ताड़ासन, उत्तानपाद आसन, पवनमुक्तासन, भुजंगआसन, शलभ आसन, उश्ट्रासन, गोमुखासन, प्राणायाम, धीमी गति से भरित्रका प्राणायाम उसके बाद श्वासन , कुंजल क्रिया से भी बहुत लाभ होता हैं और फिर ओम का जाप।
ये चीजें फायदेमंद
* साबुत चने को पानी में उबालकर उसमें नमक डालें। फिर चने को अलग करके खाली पानी पिएं। इससे न सिर्फ गले को आराम मिलता है, बल्कि शरीर को कई पौष्टिक तत्व मिल जाते है जो शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बनाते है।
* तुलसी के पत्ते को उबालकर पीना काफी फायदेमंद होता है। यह एक अच्छा एंटी-ऑक्सिडेंट होता है।
* रात में सोने से पहले आधा चम्मच घर की पिसी हुई हल्दी फांकने से बहुत आराम मिलता है। हल्दी में घाव को भरने और सूजन को ठीक करने की काफी क्षमता होती है।
* अपने खाने में विटामिन, प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम आदि का पूरा ख्याल रखें।
* हो सके तो किसी एक्सपर्ट की मदद से डाइट चार्ट बनवा लें।
अस्थमा का मछली से इलाज
हैदराबाद में मछली के जरिए किया जाने वाला इलाज लोगों में काफी मशहूर है। ऐसी मान्यता है कि करीब 150 साल पहले वीरन्ना गौड़ नाम के एक व्यक्ति थे, जो दूसरों की हमेशा मदद किया करते थे। अचानक एक दिन उनसे एक दैवीय व्यक्ति मिले। प्रसन्न होकर उन्होंने इलाज का यह सीक्रेट फॉर्म्युला बताया और कहा कि इससे लोगों का मुफ्त इलाज करना। तब से लेकर आज तक बेथानी गौड़ परिवार इस फॉर्म्युला से लोगों का मुफ्त इलाज करता आ रहा हैं। हर साल मॉनसून की शुरूआत होते ही जून महीने में हैदराबाद की बेथियानी गौड़ फैमिली के पास दुनिया भर से हजारों लोग इस तरीके से अस्थमा का इलाज कराने आते हैं।
कैसे होता है इलाज
सबसे पहले बैथिनी मछली से बनी दवा को जिंदा मुरेल मछली के मुंह में रखा जाता है और उस मछली को मरीज के मुंह में डाल दिया जाता है। दो से सवा दो इंच लंबाई की यह मछली काफी चिकनी होती है, इसलिए मुह में आसानी से स्लिप हो जाती है और मरीज भी इसे आराम से निगल लेता है। शरीर के अंदर यह 15 मिनट तक जिंदा रहती है। यह मछली गले से लेकर पेट तक जाती है। उस दौरान उसकी पूंछ और पंख फड़फड़ाने से सांस लेने का पूरा सिस्टम साफ हो जाता है। बताते हैं कि अगर इस तरीके से तीन साल तक इलाज कराएं और 45 दिनों तक उनके अनुसार डाइट लेते रहें तो अस्थमा 100 फीसदी तक ठीक हो जाता है। यह दवा मृगशिरा कार्तिक नक्षत्र यानी जून के पहले सप्ताह के आस-पास दी जाती है।

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