सावधानी बरतें - गलतियां दोबारा न हो, मौके हाथ से न छुटे
हम बचपन से सुनते आये है कि दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है पर
हमारी आदत होती है कि हम एक ही गलती या एक ही तरह की गलती की मालूम होने के बावजूद
बार-बार करते है। इन गलतियों में प्रमुख गलती समय पर निष्चित कार्य को समाप्त न
करने की गलती होता है जो आगे चलकर आदत का रूप ले लेता है।
बचपन से ही बच्चों में समय की पाबंदी का एहसास उनकी स्कूल बस के नियत समय पर आने
पर हो जाता है। इसके बावजूद कुछ बच्चे हमेषा भाग दौड़कर बस पकड़ते है। कुछ बच्चों की
बस साल में कई बार छुट जाती है और कुछ हमेषा समय के पहले पहुंच जाते है। इसमें सबसे
ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ बच्चे बहुदा देर से पहुंचते है तो कुछ बहुदा
समय पर।
बचपन में मै और मेरे बड़े भाई राजनांदगांव म्युन्सिपल स्कूल में पढ़ते थे। स्कूल
सुबह 7 बजकर 20 मिनट में लगती थी। मेरे बड़े भाई मनोज हमेशा समय से काफी पहले पहुंच
जाते थे और मै भागते दौड़ते समय पर पहुंचता। महीने में एखाद बार पहुंचने में देरी हो
जाती है और बहाना बनाना पड़ता और सजा मिलती। भाई अक्सर मुझे जल्दी तैयार होने को
कहते तो मै उनसे कहता आप रात को जल्दी सोते है और सुबह जल्दी उठते है। मै देर से
सोता हूं इसलिए देर से उठ पाता हूं पर किसी तरह से समय पर तो पहुंच जाता हूं। जिस
समय हाई स्कूल की क्लास 10-30 बजे स्कूल लगेगी। मै समय के पहले पहुचुंगा। जब मै
हाईस्कूल पहुंचा मेरे भाई कालेज पहुंच गये। 10-30 बजे की स्कूल में भी मै भाग दौड़कर
पहुंचता और स्कूल में सुबह की प्रार्थना खत्म होते-होते भागकर अपनी कक्षा की लाईन
में खड़ा हो जाता। ऐसा अक्सर होता था। प्रार्थना सभा के बाद क्लास में पहुचने बच्चों
को सजा मिलती थी परंतु मुझे कभी नही मिली कारण होता था। प्रार्थना, राष्ट्रगान एवं
विचार में 10 मिनट का समय लगना। आगे चलकर मै षालानायक चुना गया। षालानायक का काम
रोज प्रार्थना सभा को संचालित करना होता था। चुनाव के बाद प्राचार्य महोदय ने सभी
पदाधिकारी की बैठक में मुझ पर व्यंग करते हुये कहा कि इन्हे शालानायक तो आपने चुन
लिया है पर पता नही प्रार्थना सभा को यह साल में कितनी बार संचालित कर पायेंगे?
मुझे बात बुरी लगी परंतु इस बात ने मुझे समय से पूर्व पहुंचने की आदत डालने के लिए
प्रेरित किया। कई बार बहुत सी महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देकर उन्हें सहजता से लेना
भी बड़े नुकसान का कारण भी बन जाता है। जैसे भीड़ भरी बाजार में पर्याप्त नियमित
सावधानी न बरतने वाली बैंक में डकैती होना। जिंदगी में बहुत सी सावधानियां न बरतना
हमारी आदत बन जाता है। क्योंकि हमें उनसे कोई नुकसान नही होता।
एक बार नदी तट पर रहने वाले एक व्यक्ति ने अपने यहां आये साधु की बहुत सेवा की साधु
ने उसे आर्शीवाद देकर बताया तुम्हारी झोपड़ी की दाहिनी तरफ जो पत्थरों का ढेर पड़ा है
उनमें से एक पत्थर पारस पत्थर है जिससे लोहे को छुने पर वह सोना बन जाता है।
व्यक्ति के पूछने पर साधु ने बताया कि वह पत्थर अन्य पत्थरों से काफी गरम रहेगा
जिसके कारण तुम उसे पहचान सकोगे। साधु के जाने के बाद व्यक्ति उस जगह पर गया उसने
देखा वहां उस ढेर में हजारों पत्थर पड़े है। अंदाज लगाया कि सात दिन तक उनमें छानबीन
करता है तो उसे पारस पत्थर मिल जायेगा। पारस को पहचानने के लिए उसने एक विधि बनायी
वह ढेर में से एक पत्थर उठाता ठंडा लगने पर वह उसे नदी में फेंक देता। इस तरह से
ढेर भी कम होता और वह पत्थर की पहचान भी जारी रखता था। तीन दिन तक वह पत्थर उठाता
ठंडा लगते ही वह नदी में फेंक देता। चौथे दिन दोपहर तक हजारों पत्थर नदी में फेंक
चुका था। उसके हाथ अचानक एक गरम पत्थर आया पारस पत्थर पाने की वह खुषी मनाता इसके
पहले ही उसने आदत के अनुसार पत्थर नदी में फेक दी वह रूक गया। उसे एहसास हो गया कि
पारस पत्थर उसके हाथ में आया था। पर उसने अपनी असावधानी से पारस पत्थर को नदी में
अंनगिनत पत्थरों के बीच फेक दिया। जिंदगी में हम बहुत सी छोटी बातों पर ध्यान नही
देते और असावधान हो जाते है। इससे हम कई बार बड़े मौके गवां देते है जिसका एहसास बाद
में हो पाता है।
सावधानी बरतें - गलतियां दोबारा न हो, मौके हाथ से न छुट