एक वृद्ध बारिश आने के पहले गांव में आम के पेड़ लगा रहा था। एक व्यक्ति ने पूछा
बाबा पिछले दो सालों से मै आपको फलदार वृक्ष लगाते व उन्हें खाद-पानी देते देख रहा
हूं। इनके फलों का आप उपभोग कर पायेंगे भी या नहीं? फिर इतनी मेहनत क्यों?' बुजुर्ग
ने कहा हम अपने पूर्वजों के लगाये, वृक्षों के मीठे फल खा रहे है। हमारी आगे आने
वाली पीढ़ी के लिए कुछ करना, हमारा फर्ज बनता है। सचमुच अदभुत सोंच है। बुजुर्गो के
सत्कर्म यादकर हम भी सही दिशा में कार्य करें।
मै कायल हो गया अपने चचेरे छोटे भाई आशीष का। लगभग 17 साल की रिसर्च एवं मेहनत कर,
उसने हमारे दादा 'क्रांतिवीर सेठ नरसिंगदास चितलांग्या' का सन् 1920 से 1955 के
बीच के क्रिया कलाप, कागजात व फोटो ग्राफ खोज निकाले। वह जानता था कि उसकी खोज पर
लिखी किताब में हमारे परिवार तथा राजनांदगांव के कुछ परिवारों कीं ही रूचि होगी।
फिर भी उसका अथक परिश्रम व पूर्वजों के प्रति अगाध श्रद्धा मेरे लिए प्रेरणादायी
है। अपने पुरखों के सतकर्मो को हम अपनी प्रेरणा बनाए।
ऐसे समस्त प्रेरणा लेने वाले लोगों को नमन व यह अंक समर्पित।
मधुर चितलांग्या, प्रधान संपादक
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| Posted by Madhur Chitalangia
1 Comments
Mon 07 Jun 10, 1 : 41 pm |
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