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इस
गुरू-पूर्णिमा पर हम स्मरण दिलाते हैं कि गुरू कोई हाड़-मांस नहीं है। गुरू
तो एक विद्या है। वह जाति, धर्म, वर्ग की परिधि से परे है। वह किसी भी धर्म
या जाति का हो सकता है। वही गुरू तत्व को प्राप्त करा सकता है। किसी भी
गुरू-पीठ पर हम गुरू-मन्त्र का आवाहन कर सकते हैं।
गुरू विद्या है। विद्या बहुत थोड़ी है, अविद्या व्यापक होती है। अविद्या
अखिल विश्व में व्याप्त है। यह प्रपंच है। अविद्या से ही परेनी
है, दुख है, शोक है। यह मनुष्य के दुख का कारण है। जो कुछ भी देखते हैं, वह
प्रायः अविद्या में है। जितना कुछ बरतते हैं, वह अविद्या में है। आप जो सही
सुलझे ढ़ंग से अध्ययन करते हैं, चिन्तन-मनन करते हैं, उसी को इस अवसर पर
स्मरण करते हैं। यह विद्या हम सब में है। वह क्या है उसी को समझना है और
स्मरण करना है। ऐसा करने से हम सीख सकते हैं कि हमें किस तरह जीना है। बहुत
से प्राणी जीना नहीं जानते। चलना सीख सकें, उठना-बैठना सीख सकें, इसी
निमित्त आज का दिन है। यह प्रशिक्षण अपने आप में निहित है। चिन्तन-मनन के
माध्यम से इसे जाग्रत करना है। किसी उच्छृंखल व्यक्ति को अनु्सन में
रखने से उसे दुख होगा। अनुशासन भी एक तपस्या है। यह प्राणियों के लिए
कल्याणप्रद है। कोई भी बुरा कर्म कर बैठता है। इससे ग्लानि होती है,
निराशा होती है। उसकी आत्मा मर जाती है। वह चलती-फिरती लाश की तरह हो
जाता है।
एक नवयुवक एक साधु के पास गया और उनसे नौकरी दिला देने की याचना की। साधु
ने आच्चीर्वाद देते हुए कहा कि जाओ, किसी सज्जन से मिलो। जहॉं कहीं भी वह
नवयुवक गया और देखा, उसे किसी की मुखाकृति गधा की और किसी की सूअर की दीख
पड़ी। वह उस साधु के पास लौट कर गया और उन्हें इस स्थिति से अवगत कराया।
साधु जी ने उसकी कान पर एक लकड़ी का टुकड़ा रखा और पुनः उसे किसी सज्जन पुरूष
की खोज में भेंज दिया। उस युवक को
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एक
मोची मिला जो देखने में मनुष्य लगा। उसने उसी से नौकरी के लिए विनती की। उस
मोची ने स्नेहमय आश्च्वासन दिया। मोची ने एक जोड़ा सुन्दर जूता बना कर राजा
को पेश किया। राजा खुश हुआ। मोची ने राजा से पारितोषिक में उस युवक को
नौकरी दे देने का अनुरोध किया और उस बेकार युवक को नौकरी मिल गयी।
यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति से याचना करेंगे जो मनुष्य होगा तो वह अधिकार और
धन के अभाव में भी बहुत प्रेम से सान्त्वना देगा और ऐसा मार्ग-निर्देशन
देगा कि उसका अनुशरण कर आप स्वस्थ मार्ग पायेंगे। अपने देश के विभिन्न
जातियों में यदि आप भिन्नता देखेंगे तो यह रूचिकर नहीं होगा। जैसे चावल,
दाल और गेहॅूं का अलग-अलग सेवन करेंगे तो वह सुस्वादु नहीं होगा किन्तु यदि
उन्हें मिलाकर सेवन करेंगे तो वह स्वादिष्ट होगा। इसी प्रकार यदि आप
राष्ट्र की अनेकानेक जातियों को अपने साथ अलगाव का व्यवहार करते रहेंगे,
इसका कुप्रभाव अवश्यम्भावी है। अतः अपने राष्ट्रीय जीवन में हमें सभी को
अपने साथ लेकर चलना होगा। ऐसा राष्ट्रीय जीवन श्रेयस्कर होगा।
हम इस देश में किस तरह रहें, किस प्रकार अनुशासित रहें, इसका ज्ञान भी
आवश्यक है। हमारे जीवन में जाति और वर्ग का भेदभाव न हो, इसी
मनोभावना और व्यवहार से हम सम्यक् जीवन जी सकेंगे। इस पर्व का यही चिन्तन
है, यही महत्व है। अपनी आत्मा को पद्दलित न होने दें। जिसकी आत्मा पद्दलित
हो जाती है वह सब कुछ रहते हुए भी, अतृप्ति एवं असंतोष का शिकार हो जाता है।
परिवर्तन बहुत ही आवश्यक है। मनुष्य हर दिन हर क्षण नई वस्तु चाहता है।
हरेक को नये विचार, नई दिशा की आवश्यकता है। रूढ़िवादिता दुखद है। युग
के अनुसार अपने में परिवर्तन लाना चाहिए। वह नया मार्ग प्रशस्त करेगा।
मेरी बातों में आपकी रूचि के जो अनुकूल हों, उन्हें ही आप अंगीकार करेंगे।
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